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चौराचौरा कांड का इतिहास और भारतीय स्वतंत्रता संग्राम पर प्रभाव ।

चौराचौरा कांड भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का एक ऐसा अध्याय है, जिसने आंदोलन की दिशा और दृष्टिकोण को बदल दिया। यह घटना 4 फरवरी 1922 को उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले के चौराचौरा नामक स्थान पर घटी, जहां शांतिपूर्ण विरोध ने अप्रत्याशित रूप से हिंसा का रूप ले लिया। पृष्ठभूमि 1919 में जलियांवाला बाग नरसंहार के बाद, भारतीय जनता के मन में ब्रिटिश शासन के प्रति असंतोष चरम पर था। महात्मा गांधी ने 1920 में असहयोग आंदोलन की शुरुआत की, जिसमें विदेशी वस्त्रों का बहिष्कार, करों का न भुगतान और अंग्रेजी शासन के खिलाफ शांतिपूर्ण विरोध शामिल था। चौराचौरा के ग्रामीण भी इस आंदोलन का हिस्सा बने।  हालांकि, इस क्षेत्र में किसानों और मजदूरों पर ब्रिटिश पुलिस द्वारा अत्यधिक अत्याचार हो रहा था। 4 फरवरी 1922 को, एक शांतिपूर्ण प्रदर्शन को रोकने की कोशिश में पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच झड़प हो गई। घटना का विवरण चौराचौरा कस्बे में उस दिन करीब 2000 लोग अंग्रेजों के खिलाफ विरोध प्रदर्शन कर रहे थे। टकराव की शुरुआत प्रदर्शनकारियों ने थाने के सामने विरोध किया। पुलिस ने उन्हें तितर-बितर करने के लिए लाठीचार्ज...

पुर्तगालियों का भारत आगमन: इतिहास और प्रभाव | ( The Arrival of the Portuguese in India: History and Impact )

 पुर्तगालियों का भारत आगमन:  पुर्तगाली भारत आने वाले पहले यूरोपीय थे, और उनके आगमन ने भारत में यूरोपीय औपनिवेशिक युग की शुरुआत की। उनकी यात्रा व्यापार और विस्तारवाद की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण थी। यहाँ इस घटना का विस्तार से वर्णन किया गया है: पृष्ठभूमि 15वीं शताब्दी में यूरोप में मसालों की भारी मांग थी। काली मिर्च, दालचीनी, जायफल, और लौंग जैसे मसाले यूरोपीय रसोई के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण थे। उस समय व्यापार मार्ग मुख्यतः अरब और तुर्कों के नियंत्रण में था। पश्चिमी यूरोपीय देशों को इस व्यापार पर निर्भर रहना पड़ता था। पुर्तगाल ने समुद्री मार्गों के माध्यम से भारत पहुंचने का निर्णय लिया, जिससे वे मसालों का सीधा व्यापार कर सकें और मध्यस्थ व्यापारियों पर निर्भरता समाप्त हो सके। वास्को-दा-गामा का भारत आगमन तारीख: 20 मई 1498 स्थान: कालीकट (वर्तमान में कोझिकोड, केरल) नेता: पुर्तगाली नाविक वास्को-दा-गामा वास्को-दा-गामा ने भारत के लिए समुद्री मार्ग खोजने का श्रेय प्राप्त किया। उन्होंने 1497 में लिस्बन से अपनी यात्रा शुरू की और अटलांटिक महासागर के दक्षिण में "केप ऑफ गुड होप...

मध्यप्रदेश के स्वतन्त्रता संग्राम के स्त्रोतों प्राथमिक द्वितीयक स्त्रोतों का वर्णन ।(Sources of Freedom struggle in Madhya Pradesh)

मध्यप्रदेश के स्वतन्त्रता आन्दोलन के स्त्रोत (Sources of Freedom struggle in Madhya Pradesh) स्त्रोत वह माध्यम है जो किसी भी विषय वस्तु की व्यापक एवं प्रामाणिक जानकारी तथ्यों के साथ हमारे सामने रखते हैं। स्त्रोत में निहित ऐतिहासिक तथ्य इतिहास की रीढ़ की हड्डियों के समान हैं। ऐतिहासिक तथ्य ठोस, कठोर तथा यथार्थ परक होते हैं। इन्हीं तथ्यों की विश्लेषणात्मक व्याख्या इतिहास लेखन का आधार है।  किसी भी राष्ट्र के राष्ट्रीय आन्दोलन का इतिहास उस राष्ट्र की अमूल्य धरोहर होता है। राष्ट्रीय आन्दोलन की घटनाएँ, उससे जुड़े देश-भक्तों का बलिदान, स्मारक, साहित्य आदि उस देश के लोगों के लिए प्रेरणा का कार्य करते हैं। इसके साथ ही इन स्त्रोतों से राष्ट्रीय भावना भी सतत् जीवन्त रहती है। मध्यप्रदेश के स्वतन्त्रता संघर्ष से सम्बन्धित तथ्यों के प्रमुख दो स्त्रोत हैं- (अ) प्राथमिक स्त्रोत (ब) द्वितीय स्त्रोत।  (अ)प्राथमिक स्त्रोत- प्राथमिक , वे स्त्रोत कहलाते हैं, जो विषयवस्तु से प्रत्यक्ष रूप से जुड़े होते हैं। प्राथमिक स्त्रोत का संक्षिप्त वर्णन इस प्रकार है-  जलवायु परिवर्तन और तटीय क्षेत्रो...

1857 की क्रान्ति में रानी लक्ष्मीबाई के योगदान लक्ष्मीबाई की भूमिका ।

1857 की क्रान्ति में रानी लक्ष्मीबाई की भूमिका महिला सशक्तिकरण के इस दौर में भला युवतियों और महिलाओं के लिए रानी लक्ष्मीबाई से अधिक बड़ा प्रेरणास्त्रोत कौन हो सकता है, जिन्होंने पुरुषों के वर्चस्व वाले काल में महज 23 साल की आयु में ही अपने राज्य की कमान संभालते हुए अंग्रजों के दांत खट्टे कर दिए थे। रानी लक्ष्मीबाई ने अपने जीते जी अंग्रेजों को झांसी पर कब्जा नहीं करने दिया। रानी लक्ष्मीबाई का जन्म 19 नवंबर, 1835 को काशी के अस्सीघाट, वाराणसी में हुआ था। इनके पिता का नाम मोरोपंत तांबे और माता का नाम 'भागीरथी बाई' था। इनका बचपन का नाम 'मणिकर्णिका' रखा गया परन्तु प्यार से मणिकर्णिका को 'मनु' पुकारा जाता था। पिता मोरोपंत तांबे एक साधारण ब्राह्मण और अंतिम पेशवा बाजीराव द्वितीय के सेवक थे। माता भागीरथी बाई सुशील, चतुर और रूपवती महिला थीं। मनु की देखभाल के लिए कोई नहीं था इसलिए उनके पिता मोरोपंत मनु को अपने साथ बाजीराव के दरबार में ले जाते थे जहाँ चंचल एवं सुन्दर मनु ने सबका मन मोह लिया था। बाजीराव मनु को प्यार से 'छबीली' बुलाते थे।  मनु का विवाह सन् 1842 में झाँ...

मध्यप्रदेश में महात्मा गाँधी के आगमन 1918 में दक्षिण अफ्रीका से आगमन के तीन वर्ष पश्चात् ।

 मध्यप्रदेश में महात्मा गाँधी के आगमन  महात्मा गाँधी विश्व इतिहास का एक ऐसा अपूर्व और अद्भुत व्यक्तित्व हैं जिसने चिंतन और आचरण दोनों स्तरों पर परम्पराओं और सीमाओं पर अतिक्रमण किया। गाँधी एक ऐसे योद्धा हैं, जो सदा लीक छोड़कर चले। आजादी की लड़ाई के अपने पूर्ववर्ती समस्त रणबाकुरों से भिन्न हैं। उसने सत्य और अहिंसा से विश्व की सबसे अधिक ताकतवर हुकुमत के विरूद्ध जंग ही नहीं छेड़ी बल्कि एक गौरवशाली अतीत के पद्दलित, शोषित और विपन्न देश के समक्ष एक नया अध्याय भी जोड़ा। उनके आजादी के इस जंग में देश के युवा वर्ग भी उन्हीं के पद चिन्हों में चल पड़ने को आतुर हो उठे। गाँधी जी ने लगभग ढाई दशक के अन्तराल में दस बार मध्यप्रदेश की यात्राएँ की। उनकी पहली यात्रा सन् 1918 में दक्षिण अफ्रीका से आगमन के तीन वर्ष पश्चात् इन्दौर में आयोजित आठवें हिन्दी साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष के रूप में हुई। तब से उनके दौरे मध्यप्रदेश में सतत् होते रहे। इनकी मध्यप्रदेश की यात्राओं का विवरण इस प्रकार है- 1. 1918 - इन्दौर 2..1920 - रायपुर, धमतरी 3. 1921 - छिंदवाड़ा 4. 1921 - सिवनी, जबलपुर 5. 1929 खण्डवा 6. 1929 - भ...

राष्ट्रीय आंदोलन में सुभाषचंद्र बोस का योगदान स्वतंत्रता संघर्ष में गांधी एवं सुभाष के दृष्टिकोण ।

राष्ट्रीय आंदोलन में सुभाषचंद्र बोस का योगदान   सुभाष चंद्र बोस ने राष्ट्रीय आंदोलन में युवाओं को संगठित किया तथा नेहरू के साथ मिलकर 'इंडिपेंडेंस ऑफ इंडिया लीग' का भी गठन किया। उन्होंने समाजवादी विचारों को प्रोत्साहन दिया तथा कॉन्ग्रेस को समाजवाद की दिशा में मोड़ने का प्रयास किया। उन्हीं के अंतर्गत हरिपुरा अधिवेशन में योजना समिति के गठन का प्रस्ताव पारित हुआ था  आजाद हिंद फौज का गठन कर राष्ट्र के प्रति अपने समर्पण का उदाहरण प्रस्तुत किया तथा आजाद हिंद फौज के मुद्दे ने भारत में राष्ट्रीय आंदोलन को तीव्र कर दिया।  हालाँकि, आजाद हिंद फौज सैनिक मोर्चे पर अधिक सफल नहीं रही थी, न ही ब्रिटिश साम्राज्य को कोई बड़ी चुनौती दे सकी। परंतु इसने भारतीय सेना के बीच राष्ट्रवाद को फैलाकर ब्रिटिश साम्राज्य के मुख्य स्तंभ को ही क्षतिग्रस्त कर दिया।  स्वतंत्रता संघर्ष में गांधी एवं सुभाष के दृष्टिकोण में अंतर • सुभाष के लिये आज़ादी का अर्थ राजनीतिक आजादी और कुछ हद तक आर्थिक आजादी था, परंतु गांधी के लिये आजादी का पहला अर्थ नैतिक स्वतंत्रता, फिर राजनीतिक आज़ादी था। • सुभाष शीघ्रता से राजनी...

एंग्लो-मराठा युद्ध ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी और मराठा साम्राज्य के बीच तीन प्रमुख युद्ध The Anglo-Maratha Wars: Overview and Effects

 एंग्लो-मराठा युद्ध ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी और भारत में मराठा साम्राज्य के बीच तीन प्रमुख संघर्षों की एक श्रृंखला थी। 1775 से 1818 तक चले इन युद्धों ने भारत में ब्रिटिश प्रभुत्व स्थापित करने और उपमहाद्वीप के सामाजिक-राजनीतिक परिदृश्य को महत्वपूर्ण रूप से प्रभावित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।                                    आंग्ल-मराठा युद्ध 1. प्रथम आंग्ल-मराठा युद्ध (1775-1782): कारण: युद्ध पेशवा माधवराव प्रथम की मृत्यु के बाद उत्तराधिकार विवाद के कारण शुरू हुआ था। अंग्रेजों ने मराठा प्रमुखों की इच्छा के विरुद्ध, पेशवा सिंहासन के दावे में रघुनाथराव (राघोबा) का समर्थन किया था। प्रमुख लड़ाइयाँ: वाडगांव की लड़ाई (1779) और अन्य झड़पें। परिणाम : सालबाई की संधि (1782) ने युद्ध को समाप्त कर दिया, यथास्थिति बहाल की और मराठा संप्रभुता को बनाए रखते हुए अंग्रेजों को कुछ रियायतें दीं। 2. द्वितीय आंग्ल-मराठा युद्ध (1803-1805): कारण: अंग्रेजों ने भारत में फ्रांसीसी प्रभाव को रोकने और अपनी शक्ति क...

साइमन कमीशन के बहिष्कार के कारण Simon Commission

 साइमन कमीशन के बहिष्कार के कारण Simon Commission साइमन आयोग के गठन की उद्घोषणा ने भारत के लोगों में व्यापक असंतोष का संचार किया। अतः भारत के सभी प्रमुख राजनीतिक दलों ने एकमत होकर निम्नलिखित आधारों पर उसका बहिष्कार किया- • कमीशन के सभी सात सदस्य श्वेत थे, इसमें किसी भी भारतीय को प्रतिनिधित्व नहीं मिला। • भारतीय नेताओं का यह मानना था कि स्वराज संबंधी योग्यता के लिये किसी परीक्षा में शामिल होने की जरूरत नहीं है। यह तो भारतीयों का जन्मसिद्ध अधिकार है। • भारतीयों ने स्वशासन के लिये योग्यता-अयोग्यता का निर्धारण विदेशियों द्वारा करने पर ऐतराज जताया। इसके अतिरिक्त उन्होंने सरकार के इस काम को आत्म-निर्णय के सिद्धांत का उल्लंघन भी समझा। 3 फरवरी, 1928 ई. को साइमन कमीशन के बंबई तट पर उतरने के साथ ही राजनीतिक दलों ने इसका विरोध प्रारंभ कर दिया। इस दिन देशव्यापी हड़ताल आयोजित की गई। बहिष्कार कार्यक्रम की व्यापकता को देखते हुए ब्रिटिश सरकार ने साइमन कमीशन को शीघ्र ही दिल्ली भेज दिया, लेकिन वहाँ भी उसका स्वागत काले झंडों तथा 'साइमन वापस जाओ' के नारों से किया गया। केंद्रीय विधायिका ने भी उ...

असहयोग आंदोलन (1920 ई.)भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन ने जन आंदोलन के दौर में प्रवेश / खिलाफत ज्यादती तथा स्वराज के मुद्दे

 असहयोग आंदोलन (1920 ई.) 1920-21 ई. में असहयोग आंदोलन के साथ ही भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन ने जन आंदोलन के दौर में प्रवेश किया। असहयोग आंदोलन, जो आवश्यक रूप से खिलाफत मुद्दे के साथ संबद्ध था, में उस अहिंसात्मक संघर्ष की तकनीकी को पहली बार राष्ट्रीय स्तर पर अपनाया गया जिसे आगे कॉन्ग्रेस द्वारा विभिन्न आंदोलनों के प्रमुख अस्त्र के रूप में उपयोग किया जाना था। राष्ट्रीय आंदोलन में पहली बार कॉन्ग्रेस एक ऐसे आंदोलन के समर्थन में खड़ी थी जिसका स्पष्ट उद्देश्य ब्रिटिश सरकार के किसी भी दमनात्मक कार्य में असहयोग करना था। मुस्लिम लीग के इलाहाबाद अधिवेशन, 1920 में, जिसमें कई राष्ट्रवादी हिंदुओं ने भी भाग लिया था, असहयोग कार्यक्रम अपनाने के बाद से ही गांधीजी कॉन्ग्रेस पर पंजाब ज्यादती, खिलाफत ज्यादती तथा स्वराज के मुद्दे पर एक अखिल भारतीय आंदोलन शुरू करने के लिये दबाव बना रहे थे। इसी बीच कॉन्ग्रेस के उदारवादी नेताओं को भी संवैधानिक तौर-तरीकों से कुछ भी विशेष हासिल न होने का आभास होने लगा था। फिर जलियाँवाला बाग हत्याकांड पर सरकार की हंटर रिपोर्ट ने भी कॉन्ग्रेसियों में गहरा असंतोष भर दिया, क्योंकि ...

मध्यप्रदेश की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि ( गठन)

मध्यप्रदेश  की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि ( गठन) मध्यप्रदेश 1 नवम्बर, 1956 को अस्तित्व में आया और 1 नवम्बर 2000 को इस मध्यप्रदेश से छत्तीसगढ़ अलग हो गया, परन्तु इसके पूर्व (1956 के पूर्व) इतिहास के पन्नों में इसका स्वरूप कुछ और ही था।  सन् 1857 की क्रान्ति ने प्रमुख रूप से सागर-नर्मदा क्षेत्रों को ही प्रभावित किया था। दक्षिण भारत में केवल कुछ छींटे ही पहुँच पाए थे। यही कारण है कि अंग्रेजी इतिहासकारों  ने यहाँ की शांति व्यवस्था की खूब सराहना की है। नागपुर के कमिश्नर लाउडन तथा उसके डिप्टी कमिश्नरों ने अपनी रीति-नीति से इस क्षेत्र की शांति व्यवस्था को कभी भी भंग नहीं होने दिया, जबकि उत्तरी क्षेत्र बुन्देलखण्ड एक खौलती हुई कड़ाही की भाँति बन गया था। अतएव भारत के मध्य क्षेत्र में शांति स्थापित करने के लिए यह आवश्यक था कि बुन्देलखण्ड का समुचित निपटारा किया जाये। सन् 1858 में बुंदेलखंड का अंग्रेजी अधिकार क्षेत्र उत्तर-पश्चिम प्रान्त का एक अंग था। उत्तरी बुंदेलखण्ड के झाँसी, जालौन, बांदा और हमीरपुर अंग्रेजों द्वारा कब्जे में ले लिये गये थे और इनका प्रशासन आगरा स्थित लेफ्टिनेंट गवर्न...

जानिए ! अहमद शाह अब्दाली का भारत आक्रमण के कारण ?

अहमद शाह अब्दाली ( नादिर शाह का उत्तराधिकारी ) ने 1748 से 67 तक भारत पर 7 बार अक्रमं किया कुछ इतिहास करो  के अनुसार  अब्दाली का भारत पर आक्रामन  “मोहम्द शाह  रंगीला “ के काल के अंतिम दिनों मे  हुआ था माना जाता है जबकी अधिकांश इतिहास कार  मोहम्द शाह के बेटे अहमद शाह के काल मे मानते है  अहमद शाह अब्दाली के भारत आक्रमण के कई कारण थे। उनमें से कुछ मुख्य कारण निम्नलिखित हैं: साम्राज्य का विस्तार: अब्दाली का मुख्य उद्देश्य अपने साम्राज्य के विस्तार को बढ़ाना था। भारत में अब्दाली को संघर्ष की दिशा में मौके की खोज थी ताकि वह अपनी सत्ता को मजबूत कर सकें। राजनीतिक और सामरिक रक्षा: अब्दाली ने भारतीय उपमहाद्वीप में अपने राजनीतिक और सामरिक रक्षा के हिस्से के रूप में भाग लिया। उन्हें भारत के विविध शासकों के बीच संघर्ष को संतुष्ट करने के लिए इस प्रकार का संयुक्त प्रयास करने की जरूरत थी। सांस्कृतिक संदर्भ: अब्दाली को भारतीय सांस्कृतिक और आर्थिक संपत्ति के प्रति रुचि थी। भारत में अमीरियों और शासकों के धन और संपत्ति का प्राचीन इतिहास था, जिसे अब्दाली को अपने लाभ के लिए...