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महासागरीय तापमान को प्रभावित करने वाले कारक ।

 महासागर पृथ्वी के जलवायु तंत्र का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। महासागर का तापमान कई प्राकृतिक और मानव-जनित कारणों से प्रभावित होता है। यह तापमान न केवल समुद्री जीवों और पारिस्थितिकी तंत्र को प्रभावित करता है, बल्कि वैश्विक जलवायु परिवर्तन में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। आइए जानते हैं महासागर के तापमान को प्रभावित करने वाले मुख्य कारक। 1. सौर विकिरण (Solar Radiation) सूर्य से आने वाली ऊष्मा महासागर के तापमान का सबसे प्रमुख निर्धारक होती है। भूमध्य रेखा के पास, सूर्य की किरणें सीधी पड़ती हैं, जिससे वहां का जल अधिक गर्म होता है, जबकि ध्रुवीय क्षेत्रों में सूर्य की किरणें तिरछी पड़ने के कारण जल अपेक्षाकृत ठंडा रहता है। 2. महासागरीय धाराएँ (Ocean Currents) गर्म और ठंडी महासागरीय धाराएँ पानी के तापमान को संतुलित करने में मदद करती हैं। गर्म धाराएँ, जैसे कि गल्फ स्ट्रीम, ठंडे क्षेत्रों में गर्मी पहुंचाती हैं, जबकि ठंडी धाराएँ, जैसे कि कैलिफोर्निया करंट, गर्म क्षेत्रों में ठंडक लाती हैं। 3. वायुमंडलीय स्थितियाँ (Atmospheric Conditions) हवा का दबाव, मानसून, और तूफान जैसी वायुमंडलीय घट...

पृथ्वी की आंतरिक संरचना के भाग (Parts of the Interior Structure of the Earth)

भूकंपीय तरंगों के अध्ययन के आधार पर पृथ्वी की आंतरिक संरचना को तीन भागों में विभक्त किया जाता है। भूपर्पटी (Crust) यह पृथ्वी का सबसे बाहरी एवं ठोस भाग है। इसकी औसत मोटाई 33 किमी. है। भूपर्पटी को मोटाई महाद्वीपों व महासागरों के नीचे भिन्न-भिन्न है। महाद्वीपीय धागों में इसकी मोटाई लगभग 48 किमी तक पाई जाती है जबकि महासागरों के नीचे इसकी औसत मोटाई 5 किमी. है। क्रस्ट का महाद्वीपीय भाग ग्रेनाइट च‌ट्टानों से जबकि महासागरीय भाग बेसाल्ट च‌ट्टानों से निर्मित है। कस्ट में सिलिकन (Si) और एल्युमिनियम (AI) की अधिकता के कारण इसे सियाल (Sial) भी कहते हैं। भूपर्पटी को दो भागों में बाँटा जाता है- एक ऊपरी सतह और दूसरी निचली सतह। ऊपरी सतह मुख्यतः महाद्वीपीय भागों द्वारा निर्मित है और असतत् (Discontinuous) है। इसका औसत घनत्व 2.65 gm/cm² है। निचली सतह सतत् (Continuous) है जो महाद्वीपों के नीचे महासागरीय तल पर पाई जाती है। इसका औसत घनत्व 3.0 gm/cm' है। अतः महाद्वीपीय पटल (Continental Crust) की संरचना, बनावट तथा उत्पत्ति महासागरीय पटल (Oceanic Crust) से भिन्न है। क्रस्ट की में दोनों परतें क्रमशः सियाल व स...

तापमान के वितरण को प्रभावित करने वाले कारक

 तापमान जलवायु का सर्वाधिक महत्वपूर्ण तत्व है। अतः धरातल पर तापमान के अनुसार ही जलवायु प्रदेश और जलवायु के अनुसार वनस्पति प्रदेश निश्चित होते हैं। यही क्यों धरातल पर सभी प्राणियों, जीव-जन्तुओं तथा मानव के जीवन का आधार भी तापमान ही है। अतः पृथ्वी के धरातल पर तापमान के वितरण का भौगोलिक अध्ययन बहुत ही महत्वपूर्ण विषय है। धरातल पर तापमान के वितरण के अनेक रूप हैं यथा-(i) ऊर्ध्वाधरवितरण (Vertical Distribution), (ii) क्षैतिज वितरण (Horizontal Distribution), (iii) प्रादेशिक वितरण (Regional Distribution) व (iv) कालिक वितरण (Temporal Distribution) आदि। चूँकि तापमान का वितरण अनेक कारकों से प्रभावित होता है अतः तापमान के वितरण को समझने से पूर्व उन कारकों की व्याख्या को समझ लेना आवश्यक है जो कि तापमान के वितरण को प्रभावित करते हैं। तापमान के वितरण को प्रभावित करने वाले कारक तापमान के वितरण को प्रभावित करने वाले कारक निम्न प्रकार हैं- 1. अक्षांश (Latitude) - धरातल पर तापमान का वितरण सदा अक्षांश के अनुसार होता है, क्योंकि धरातल पर पहुँचने वाली सूर्य की किरणों का कोण पृथ्वी की घूर्णन गति के कारण ...

भूमध्य रेखीय या विषुवत् रेखीय जलवायु प्रदेश की विशेषताएँ

 भूमध्य रेखीय या विषुवत् रेखीय जलवायु प्रदेश की विशेषताएँ   स्थिति एवं विस्तार (Location and Extent)- इस जलवायु का विस्तार 50-10 से अक्षांश तक विषुवत रेखा के दोनों ओर है। इस जलवायु का विस्तार कभी-कभी 15. 25° अक्षांश तक हो जाता है। दक्षिणी अमेरिका के उत्तर में अफ्रीका के मध्य में तथा दक्षिणी पूर्वी एशिया महाद्वीप भाग में इस प्रकार की जलवायु पायी जाती है। जलवायु (Climate)- वर्षभर समान, उष्ण तथा तर जलवायु तापमान (Temperature) - सूर्य की किरणें वर्षभर सीधे पड़ने के कारण तापमान सदैव ऊँचा बना रहता है। औसत मासिक तापमान 18°C से अधिक रहता है। ऐसे भी स्थान हैं जहाँ औसत मासिक तापमान 24°C-27°C अंकित किया जाता है। इन क्षेत्रों में वार्षिक तापमान 2°-3°C से अधिक नहीं होता। दिन का अधिकतम तापमान 38°C से अधिक नहीं हो पाता है। वायुदाब एवं पवन (Pressure and Wind) - यहाँ पवनों का संचार मंद गति से विभिन्न दिशाओं में होता है। ताप प्रवणता अधिक तापमान के कारण मंद होती है, जिस कारण वायुदाब प्रवणता भी कम होती है। पवन संचार प्रवणता की ढाल पर निर्भर करता है। अतः तीव्र प्रवणता में पवन संचार और मंद प...

Oceanography समुद्र विज्ञान: प्रकृति, विषय और मानव जीवन में महत्व

समुद्र विज्ञान (Oceanography) एक ऐसा बहु-विषयक विज्ञान है, जो महासागरों और समुद्रों के रहस्यमय पहलुओं का अध्ययन करता है। पृथ्वी के 71% हिस्से को महासागर ने घेर रखा है, जो न केवल हमारे पर्यावरण को संतुलित रखते हैं, बल्कि जीवन का प्रमुख स्रोत भी हैं।  हम समुद्र विज्ञान की प्रकृति, विषय क्षेत्र, और मानव जीवन के लिए इसके महत्व को विस्तार से समझेंगे। समुद्र विज्ञान क्या है? समुद्र विज्ञान महासागरों और समुद्रों की भौतिक, रासायनिक, जैविक और भूवैज्ञानिक संरचना का अध्ययन है। इसे चार प्रमुख शाखाओं में विभाजित किया जाता है: भौतिक समुद्र विज्ञान (Physical Oceanography): महासागर की धाराएं, लहरें, ज्वार-भाटा, और पानी के तापमान का अध्ययन। रासायनिक समुद्र विज्ञान (Chemical Oceanography): महासागर के पानी की रासायनिक संरचना, खनिज तत्व, और प्रदूषण का विश्लेषण। जैविक समुद्र विज्ञान (Biological Oceanography): महासागरों में पाए जाने वाले जीवों और पारिस्थितिकी तंत्र का अध्ययन। भूवैज्ञानिक समुद्र विज्ञान (Geological Oceanography): समुद्र के तल और भूवैज्ञानिक संरचना का विश्लेषण। समुद्र विज्ञान...

जनसंख्या वितरण को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारक

  जनसंख्या को प्रभावित करने वाले कारक जनसंख्या को प्रभावित करने वाले कारक विभिन्न प्रकार के भौगोलिक, आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, और राजनीतिक पहलुओं से जुड़े होते हैं। ये कारक यह निर्धारित करते हैं कि किसी क्षेत्र में जनसंख्या घनत्व और वितरण कैसा होगा। इन कारकों को मुख्यतः दो वर्गों में बांटा जा सकता है: 1. प्राकृतिक (भौतिक) कारक (i) जलवायु: अनुकूल जलवायु (जैसे मॉडरेट तापमान और पर्याप्त वर्षा वाले क्षेत्र) अधिक जनसंख्या को आकर्षित करते हैं। अत्यधिक ठंडे (साइबेरिया), गर्म (सहारा मरुस्थल), या आर्द्र जलवायु (अमेज़न वर्षावन) वाले क्षेत्रों में जनसंख्या कम होती है। (ii) भू-आकृति (स्थलाकृति): समतल और उपजाऊ भूमि वाले क्षेत्र (जैसे गंगा-यमुना का मैदान) घनी आबादी वाले होते हैं। पहाड़ी, दुर्गम और कठिन स्थलाकृति वाले क्षेत्रों (जैसे हिमालय) में जनसंख्या कम होती है। (iii) मिट्टी की उर्वरता: उपजाऊ मिट्टी (जैसे नदी घाटियों में) कृषि योग्य होती है, जिससे जनसंख्या घनत्व अधिक होता है। बंजर भूमि या मरुस्थलीय क्षेत्रों में जनसंख्या घनत्व कम होता है। (iv) जल संसाधन: नदियों, झीलों औ...

मानव की प्राथमिक, द्वितीयक, तृतीयक एवं चतुर्थक आर्थिक क्रियाकलाप । (Primary, secondary, tertiary and quaternary economic activities of humans

मानव की आर्थिक क्रियाएँ (economic activities of humans ) आर्थिक भूगोल मानव की समस्त आर्थिक क्रियाओं व जीविकोपार्जन के साधनों (Means of livelihood) का अध्ययन करता है। मानव की उत्पादन सम्बन्धी आर्थिक क्रियाओं को टूमैन एवं अलेक्जेण्डर द्वारा निम्न श्रेणियों में बाँटा गया है- 1. प्राथमिक उत्पादन सम्बन्धी क्रियाएँ (Primary Activities) - जिनमें प्रकृतिदत्त संसाधनों का सीधा उपयोग होता है। कृषि कार्य में मिट्टी का सीधा उपयोग फसलें उगाने के लिए किया जाता है। इस प्रकार जल क्षेत्रों में मछली पकड़ना, खानों से कोयला, लोहा आदि खनिज निकालना, वनों से लकड़ियाँ काटना अथवा पशुओं से ऊन, कपड़ा, बाल, खालें, हड्डियाँ आदि प्राप्त करना प्राथमिक उत्पादन क्रियाएँ हैं। इनसे सम्बन्धित उद्योगों को प्राथमिक उद्योग कहा जाता है। जैसे, कृषि करना, खानें खोदना, मछली पकड़ना, आखेट करना, वस्तुओं का संचय करना, वन सम्बन्धी उद्योग आदि। इस समूह में कार्यरत् व्यक्ति लाल कॉलर श्रमिक (Red collar worker) कहलाते हैं। 2.  द्वितीयक क्रियाएँ  (Secondary Activities) - जिनके अन्तर्गत प्रकृतिदत्त संसाधनों का सीधा उपयोग नहीं किय...

विकिरण (Radiation) किसे कहते हैं ? विकिरण के प्रमुख रूपों का उल्लेख

जिस क्रिया द्वारा ताप बिना किसी भौतिक माध्यम के एक वस्तु से दूसरी वस्तु में प्रवेश करता है उस क्रिया को विकिरण कहते हैं। वस्तुतः प्रत्येक वस्तु एक निश्चित तापमान पर अपनी ऊष्मा को विभिन्न प्रकार की तरंगों द्वारा छोड़ती है। यही विकिरण के कई रूप हैं। जब कोई वस्तु किसी तापमान पर हर प्रकार की तरंगों द्वारा अधिकतम ताप छोड़ती है तो उसे ब्लेक बॉडी (Black Body) कहा जाता है और उससे होने वाले विकिरण को कृष्णिका विकिरण (Black body Radiation) कहते हैं। पृथ्वी के धरातल से होने वाला विकिरण दूसरे प्रकार का होता. है।  किन्तु उसी तापमान पर जब कोई वस्तु केवल कुल विशेष तरंगों के रूप में ही विकिरण करती है तो उसे वर्णात्मक विकिरण (Selective Radiation) कहा जाता है। वायुमण्डल की कुछ गैसें वरणात्मक विकिरण ही करती हैं। पृथ्वी सौर्थिक ऊर्जा का 51% भौग प्राप्त करती है। सूर्य से आने वाली यह ऊर्जा सूक्ष्म लहरों के रूप में आती है जो धरातल द्वारा ग्रहण की जाती है। धरातल इसे ग्रहण कर ऊष्मा में बदल देती है। सौर्थिक ऊर्जा को इस प्रकार ग्रहण करने और उसे ऊष्मा में बदल देने से धरातल गरम हो उठता है। फलस्वरूप तप्त धरात...

मौसम व जलवायु में अन्तर , मौसम व जलवायु में अन्तर स्पष्ट करते हुए जलवायु व मौसम के तत्वों का संक्षेप में वर्णन

 स्थल एवं जलमण्डल के अतिरिक्त वायुमण्डल का अध्ययन भी भौतिक भूगोल में अपना विशिष्ट स्थान रखता है। हमारे चारों ओर वायु का आवरण विस्तृत रूप से तना हुआ है। पी. लेक महोदय के शब्दों में वायुमण्डल की परिभाषा इस प्रकार दी जा सकती है-"The outer envelope of the gases of the planet upon which we live is called the atmosphere." मानव जीवन पर वायुमण्डल तत्व अपना प्रभाव पूर्णतः रखता है। इन सभी वायुमण्डलीय तत्वों के सामूहिक रूप को ही जलवायु की संज्ञा दी जाती है। जलवायु एक यौगिक शब्द है, जिसमें जल व वायु दोनों का ही योग है। जल का अर्थ है, आर्द्रता, उसकी मात्रा तथा उत्पत्ति। वायु का अर्थ है हवा की गति, उसकी दिशा व उत्पत्ति, जो दबाव में अन्तर होने के कारण उत्पन्न होती है। दबाव स्वयं तापमान पर आधारित होता है। इस प्रकार यह स्पष्ट है कि उक्त तत्वों की मिश्रित व्याख्या ही जलवायु के अन्तर्गत आती है। मौसम का अर्थ एवं परिभाषाएँ  (Meaning and Definitions of Weather) मौसम से अर्थ है प्रतिदिन की परिवर्तनशील वायुमण्डलीय घटनाएँ। मौसम सदैव ही परिवर्तनशील रहता है। कोपे तथा द लॉग के अनुसार-किसी विशेष स्थान और...

एक आदर्श नियोजन प्रदेश की विशेषताएँ Characteristics of An Ideal Planning Region

एक आदर्श नियोजन प्रदेश की विशेषताएँ (Characteristics of An Ideal Planning Region) प्रदेश एक सीमित इकाई है जिसकी सीमाएँ, भौतिक, प्रशासनिक, राजनीतिक आदि हो सकती हैं  जिसके स्वयं के विशेष लक्षण होते    हैं                                                    जो प्रदेश में सम्मिलित सभी क्षेत्रों को जोड़कर रखते हैं, इसलिए इसे एक जीवीय सम्पूर्ण इकाई की संज्ञा दी जा सकती है, टेलर के अनुसार, "नियोजन प्रदेश एक ऐसा क्षेत्र होता है जो अपने आस-पास के क्षेत्रों से बहुत भिन्न होते हुए उनसे जुड़ा रहता है क्योंकि अभिकेन्द्रीय शक्तियाँ उपस्थित होती हैं या मानव जनित। अतः नियोजन प्रदेश एक ऐसी इकाई होती है जिसे नियोजन का आधार बनाया जा सकता है, क्योंकि एक तरफ तो उसमें स्वयं के कुछ लक्षण होते हैं जो अपने आस-पास के क्षेत्र से भिन्न होते हैं, दूसरी ओर यह क्षेत्रों से भी इस प्रकार से एकीकरणीत होता है कि उनके सन्दर्भ के बिना सही प्रकार से जाना ही नहीं जा सकता। ज...

भौगालिक प्रदेश की अवधारणा क्या है? What is the concept of geographical region? प्रदेश' की संकल्पना ,

भौगालिक प्रदेश की अवधारणा क्या है? What is the concept of geographical region इसकी महत्ता को स्पष्ट कीजिए। प्रदेश की अवधारणा एवं परिभाषा (Concept of Definition of Region) पृथ्वी तल की वह इकाई-क्षेत्र जो अपने विशेष अभिलक्षणों के कारण अपनी समीपवर्ती अन्य इकाइयों, क्षेत्रों से भिन्न समझा जाता है, 'प्रदेश' कहलाता है। भूगोलविदों द्वारा 'प्रदेश' शब्द की व्याख्या कई अर्थों में व्यापक रूप से की गई है। प्रदेश का तात्पर्य किसी क्षेत्र विशेष की प्रकृति से होता है। प्रदेश सामान्यतः समान गुण और समान प्रकृति वाले क्षेत्र को कहते हैं अर्थात् सम्पूर्ण प्रदेश के लक्षणों में समांगता (Homogeneity) होती है। आधुनिक युग में प्रदेश को व्यापक, सूक्ष्म और शास्त्रीय अर्थ प्रदान किया गया है। प्रदेश एक ऐसी युक्ति है जिसके द्वारा पृथ्वी तल पर समानताओं और विभिन्नताओं को समझा जाता है। प्रदेश एक ऐसा क्षेत्र है जो कुछ विशेषताओं से युक्त एक इकाई है। जलवायु परिवर्तन और तटीय क्षेत्रों पर इसका प्रभाव यह भी पढ़ें Click here परिभाषाएँ- 'प्रदेश' शब्द भूगोल में क्षेत्रीय अध्ययन के साथ प्रयुक्त होता रहा...

प्रादेशिक नियोजन का उ‌द्भव और प्रकार अवधारणा प्रादेशिक नियोजन के विकास । (Concept of Regional Planning)

बाई.एन. पेट्रिक (Y. N. Petrik) के अनुसार, "प्रादेशिक नियोजन प्रदेश के प्राकृतिक संसाधन के उपयोग, प्राकृतिक पर्यावरणीय रूपान्तरण, उत्पादन शक्तियों तथा उसके विवेकपूर्ण संगठन पर आधारित है।" एल्डन व मॉरगन (1974) ने अपने लेख में इस बात पर जोर दिया है कि "प्रादेशिक नियोजन को न तो केवल आर्थिक नियोजन और न ही केवल भौतिक नियोजन के रूप में स्वीकार किया जा सकता है।" अपितु यह एक ऐसा नियोजन है जिसकी रुचि का केन्द्र भौतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक, राजनीतिक तत्वों को किसी प्रदेश विशेष के सन्दर्भ में समन्वित रूप की सोच पर केन्द्रित होती है।" इस तरह की संकल्पना में किसी प्रदेश विशेष की कोई विशेष अनुभव पूर्व समस्याएँ नहीं होतीं जिनके निदान के लिए परियोजना निर्मित होती है। इस तरह की संकल्पना में बहुस्तरीय प्रदानुक्रमण की कल्पना की जाती है। अतः नियोजन प्रक्रिया में प्रदेश (Space) का घटक भी चिन्हित होता है।  किसी प्रदेश के विकास हेतु अपने विभिन्न रूपों में एक प्रकार की दिशा निर्देशिका है कि प्राकृतवास, आर्थिकी एवं सामाजिकता के समाकलित विकास का पर्यवेक्षण है। फ्रीडमैन (1972) के श...

भारत की भूगर्भिक संरचना: समृद्ध खनिज संसाधन और प्राकृतिक संपत्ति |

भूगर्भिक संरचना का अभिप्राय (Meaning of Geological Structure)भूगर्भिक संरचना का अभिप्राय किसी देश या प्रदेश के भूतल के नीचे पाई जाने वाली चट्टानों की संरचना एवं बनावट से होता है। किसी देश के भौगोलिक अध्ययन में वहाँ की भूगर्भिक संरचना का विशेष महत्व होता है क्योंकि इसी के आधार पर ही वहाँ की स्थलाकृति का विकास होता है।                        भारत की भूगर्भिक संरचना का इतिहास भूगर्भिक संरचना का इतिहास उतना ही पुराना है जितनी पुरानी हमारी पृथ्वी। भारतवर्ष के भूगर्भिक इतिहास का अध्ययन करने से ज्ञात होता है कि यहाँ प्राचीनतम से लेकर आधुनिकतम चट्टानें या शैलें पायी जाती हैं। यहाँ आद्य महाकाव्य (Arachean Era) से लेकर नवीन नव जीवकल्प (Guaternary Era) तक की शैलें पायी जाती हैं। भूगर्भिक संरचना की दृष्टि से भारतवर्ष को निम्नलिखित दो भागों में बाँटा जा सकता है- 1. उत्तरी भारत -उत्तरी भारत के अधिकांश भाग की चट्टानों का निर्माण टरशियरी कल्प तथा क्वार्टनरी कल्प में हुआ है। दूसरे शब्दों में, यह कहा जा सकता है कि उत्तरी भारत की चट्टानें नव...