सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

मानव की प्राथमिक, द्वितीयक, तृतीयक एवं चतुर्थक आर्थिक क्रियाकलाप । (Primary, secondary, tertiary and quaternary economic activities of humans

मानव की आर्थिक क्रियाएँ (economic activities of humans) आर्थिक भूगोल मानव की समस्त आर्थिक क्रियाओं व जीविकोपार्जन के साधनों (Means of livelihood) का अध्ययन करता है।

मानव की उत्पादन सम्बन्धी आर्थिक क्रियाओं को टूमैन एवं अलेक्जेण्डर द्वारा निम्न श्रेणियों में बाँटा गया है-

1. प्राथमिक उत्पादन सम्बन्धी क्रियाएँ (Primary Activities) - जिनमें प्रकृतिदत्त संसाधनों का सीधा उपयोग होता है। कृषि कार्य में मिट्टी का सीधा उपयोग फसलें उगाने के लिए किया जाता है। इस प्रकार जल क्षेत्रों में मछली पकड़ना, खानों से कोयला, लोहा आदि खनिज निकालना, वनों से लकड़ियाँ काटना अथवा पशुओं से ऊन, कपड़ा, बाल, खालें, हड्डियाँ आदि प्राप्त करना प्राथमिक उत्पादन क्रियाएँ हैं। इनसे सम्बन्धित उद्योगों को प्राथमिक उद्योग कहा जाता है। जैसे, कृषि करना, खानें खोदना, मछली पकड़ना, आखेट करना, वस्तुओं का संचय करना, वन सम्बन्धी उद्योग आदि। इस समूह में कार्यरत् व्यक्ति लाल कॉलर श्रमिक (Red collar worker) कहलाते हैं।


2. द्वितीयक क्रियाएँ (Secondary Activities) - जिनके अन्तर्गत प्रकृतिदत्त संसाधनों का सीधा उपयोग नहीं किया जाता, वरन् उनको साफ, परिष्कृत अथवा रूप-परिवर्तित कर उपयोग के योग्य बनाया जाता है। इससे उनके मूल्य में वृद्धि होती है। जैसे लोहे को गलाकार इस्पात के यन्त्र अथवा अन्य वस्तुएँ बनाना, गेहूँ से आटा या मैदा बनाना, कपास और ऊन से कपड़ा बनाना, लकड़ी से फर्नीचर, कागज आदि बनाना। इन वस्तुओं को तैयार करने वाले उद्योगों को गौण उद्योग कहा जाता है। इनके अन्तर्गत सभी प्रकार के निर्माण उद्योग आते हैं। इस समूह के व्यक्ति नीला कॉलर श्रमिक (blue collar worker) कहे जाते हैं।


3. तृतीयक उत्पादन क्रियाएँ (Tertiary Activities) - जिनके अतर्गत वे सभी क्रियाएँ आती हैं, जो प्राथमिक अथवा गौण उत्पादन की वस्तुओं को उपभोक्ता, उद्योगपतियों तक पहुँचाने से सम्बन्धित होती हैं। इस प्रकार की क्रियाओं के अन्तर्गत वस्तुओं का स्थानान्तरण (transportation), संचार और संवादवाहन (communication), वितरण (distribution) एवं संस्थाओं और व्यक्तियों की सेवाएँ (merchants, brokers, bankers , traders) तथा विनिमय (exchange) सम्मिलित की जाती है। इस समूह के व्यक्ति गुलाबी कॉलर श्रमिक (pink collar worker) कहलाते हैं।

4. चतुर्थक सेवाएँ (Quaternary Services)- चतुर्थक सेवाएँ विशेष प्रकार के सेवा कार्य हैं जिनका सम्बन्ध व्यावसायिक तथा प्रशासकीय सेवाओं से है। इन सेवाओं के अन्तर्गत वित्तीय (financial), स्वास्थ्य सेवा कार्य (health service worker), सूचना प्रक्रमण (information processing), शिक्षण (teaching), राजकीय सेवाएँ तथा मनोरंजन क्रिया (entertainment activity) सम्मिलित हैं। विशेषीकृत तकनीकी (specialized technical), संचार के साधन (communication) तथा अभिप्रेरण  तथा नेतृत्व की क्षमता आम लोगों को इन क्रियाओं से जोड़ती है। सभी चतुर्थक क्रियाएँ कार्यालय भवन या विद्यालय, थियेटर, होटल तथा चिकित्सा संस्थान द्वारा प्रदत्त विशेषीकृत वातावरण (specialized environment) में होती हैं। इस समूह के व्यक्तियों को सफेद कॉलर श्रमिक (white collar worker) कहते हैं।


5. पंचम क्रियाएँ (Quinary activities) - अन्य समूहों की क्रियाओं की तुलना में पंचम क्रियाएँ बहुत प्रतिबन्धित आकार में हैं। इस समूह के अधिकांश व्यक्ति मुख्य कार्यकारी अधिकारी तथा राजकीय एवं निजी सेवाओं के सर्वोच्च अधिकारी होते हैं। इसके अतिरिक्त महत्वपूर्ण योजना तथा समस्या निदानमूलक सेवाएँ (problem solving services) प्रदान करने वाले शोध वैज्ञानिक, विधि अधिकारी, वित्तीय सलाहकार, व्यावसायिक परामर्शदाता (professional consultants) इस समूह के अन्तर्गत आते हैं। अधिकांश उच्चकोटि की विश्लेषणात्मक (high-order analytical) तथा प्रबन्धात्मक (managerial) क्रियाएँ बड़े नगरीय केन्द्रों या बड़े विश्वविद्यालय, चिकित्सालय तथा शोध केन्द्रों पर उपलब्ध होती हैं। इस समूह में कार्यरत् व्यक्तियों को सुनहरी कॉलर श्रमिक (gold collar worker) कहते हैं।


उपभोग (Consumption) - उत्पादन के उपरान्त आर्थिक क्रिया का द्वितीय महत्वपूर्ण पक्ष वस्तुओं तथा सेवाओं के उपभोग से सम्बन्धित है। भूगोलवेत्ताओं ने अभी तक उपभोग भूगोल (geography or consumption) की अवहेलना की है। आज उपभोग प्रतिरूप तथा उपभोक्ता के व्यवहार (consumer behaviour) के स्थानिक पक्ष का अध्ययन किया जाने लगा है। उपभोग की माँग पर ही उत्पादन प्रक्रिया निर्भर करती है।


इसी प्रकार उत्पादन एवं उपभोग के पश्चात् तृतीय महत्वपूर्ण आर्थिक क्रिया विनिमय है। विनिमय के भी दो स्वरूप होते हैं- स्थानान्तरण अथवा वितरण, जिनके अनुसार वस्तुएँ या सेवाएँ एक स्थान से दूसरे स्थान को ले जायी जाती हैं, जिससे उनके मूल्य में वृद्धि होती है। परिवहन इसी प्रकार की क्रिया है। वितरण के अन्तर्गत वस्तुओं या सेवाओं का स्वामित्व • अथवा अधिकार परिवर्तन होता है। व्यापार या वाणिज्य इस प्रकार की प्रमुख क्रिया है।



NOTE- इसी तरह के विषयों  पर आगामी पोस्ट प्राप्त करने के लिए हमारे टेलीग्राम समूह में शामिल हों।

telegram link- join telegram channel

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

मध्यप्रदेश के स्वतन्त्रता संग्राम के स्त्रोतों प्राथमिक द्वितीयक स्त्रोतों का वर्णन ।(Sources of Freedom struggle in Madhya Pradesh)

मध्यप्रदेश के स्वतन्त्रता आन्दोलन के स्त्रोत (Sources of Freedom struggle in Madhya Pradesh) स्त्रोत वह माध्यम है जो किसी भी विषय वस्तु की व्यापक एवं प्रामाणिक जानकारी तथ्यों के साथ हमारे सामने रखते हैं। स्त्रोत में निहित ऐतिहासिक तथ्य इतिहास की रीढ़ की हड्डियों के समान हैं। ऐतिहासिक तथ्य ठोस, कठोर तथा यथार्थ परक होते हैं। इन्हीं तथ्यों की विश्लेषणात्मक व्याख्या इतिहास लेखन का आधार है।  किसी भी राष्ट्र के राष्ट्रीय आन्दोलन का इतिहास उस राष्ट्र की अमूल्य धरोहर होता है। राष्ट्रीय आन्दोलन की घटनाएँ, उससे जुड़े देश-भक्तों का बलिदान, स्मारक, साहित्य आदि उस देश के लोगों के लिए प्रेरणा का कार्य करते हैं। इसके साथ ही इन स्त्रोतों से राष्ट्रीय भावना भी सतत् जीवन्त रहती है। मध्यप्रदेश के स्वतन्त्रता संघर्ष से सम्बन्धित तथ्यों के प्रमुख दो स्त्रोत हैं- (अ) प्राथमिक स्त्रोत (ब) द्वितीय स्त्रोत।  (अ)प्राथमिक स्त्रोत- प्राथमिक , वे स्त्रोत कहलाते हैं, जो विषयवस्तु से प्रत्यक्ष रूप से जुड़े होते हैं। प्राथमिक स्त्रोत का संक्षिप्त वर्णन इस प्रकार है-  जलवायु परिवर्तन और तटीय क्षेत्रो...

प्रादेशिक नियोजन का उ‌द्भव और प्रकार अवधारणा प्रादेशिक नियोजन के विकास । (Concept of Regional Planning)

बाई.एन. पेट्रिक (Y. N. Petrik) के अनुसार, "प्रादेशिक नियोजन प्रदेश के प्राकृतिक संसाधन के उपयोग, प्राकृतिक पर्यावरणीय रूपान्तरण, उत्पादन शक्तियों तथा उसके विवेकपूर्ण संगठन पर आधारित है।" एल्डन व मॉरगन (1974) ने अपने लेख में इस बात पर जोर दिया है कि "प्रादेशिक नियोजन को न तो केवल आर्थिक नियोजन और न ही केवल भौतिक नियोजन के रूप में स्वीकार किया जा सकता है।" अपितु यह एक ऐसा नियोजन है जिसकी रुचि का केन्द्र भौतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक, राजनीतिक तत्वों को किसी प्रदेश विशेष के सन्दर्भ में समन्वित रूप की सोच पर केन्द्रित होती है।" इस तरह की संकल्पना में किसी प्रदेश विशेष की कोई विशेष अनुभव पूर्व समस्याएँ नहीं होतीं जिनके निदान के लिए परियोजना निर्मित होती है। इस तरह की संकल्पना में बहुस्तरीय प्रदानुक्रमण की कल्पना की जाती है। अतः नियोजन प्रक्रिया में प्रदेश (Space) का घटक भी चिन्हित होता है।  किसी प्रदेश के विकास हेतु अपने विभिन्न रूपों में एक प्रकार की दिशा निर्देशिका है कि प्राकृतवास, आर्थिकी एवं सामाजिकता के समाकलित विकास का पर्यवेक्षण है। फ्रीडमैन (1972) के श...

मध्यप्रदेश की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि ( गठन)

मध्यप्रदेश  की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि ( गठन) मध्यप्रदेश 1 नवम्बर, 1956 को अस्तित्व में आया और 1 नवम्बर 2000 को इस मध्यप्रदेश से छत्तीसगढ़ अलग हो गया, परन्तु इसके पूर्व (1956 के पूर्व) इतिहास के पन्नों में इसका स्वरूप कुछ और ही था।  सन् 1857 की क्रान्ति ने प्रमुख रूप से सागर-नर्मदा क्षेत्रों को ही प्रभावित किया था। दक्षिण भारत में केवल कुछ छींटे ही पहुँच पाए थे। यही कारण है कि अंग्रेजी इतिहासकारों  ने यहाँ की शांति व्यवस्था की खूब सराहना की है। नागपुर के कमिश्नर लाउडन तथा उसके डिप्टी कमिश्नरों ने अपनी रीति-नीति से इस क्षेत्र की शांति व्यवस्था को कभी भी भंग नहीं होने दिया, जबकि उत्तरी क्षेत्र बुन्देलखण्ड एक खौलती हुई कड़ाही की भाँति बन गया था। अतएव भारत के मध्य क्षेत्र में शांति स्थापित करने के लिए यह आवश्यक था कि बुन्देलखण्ड का समुचित निपटारा किया जाये। सन् 1858 में बुंदेलखंड का अंग्रेजी अधिकार क्षेत्र उत्तर-पश्चिम प्रान्त का एक अंग था। उत्तरी बुंदेलखण्ड के झाँसी, जालौन, बांदा और हमीरपुर अंग्रेजों द्वारा कब्जे में ले लिये गये थे और इनका प्रशासन आगरा स्थित लेफ्टिनेंट गवर्न...