सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

भौगालिक प्रदेश की अवधारणा क्या है? What is the concept of geographical region? प्रदेश' की संकल्पना ,

भौगालिक प्रदेश की अवधारणा क्या है? What is the concept of geographical region इसकी महत्ता को स्पष्ट कीजिए। प्रदेश की अवधारणा एवं परिभाषा (Concept of Definition of Region)

पृथ्वी तल की वह इकाई-क्षेत्र जो अपने विशेष अभिलक्षणों के कारण अपनी समीपवर्ती अन्य इकाइयों, क्षेत्रों से भिन्न समझा जाता है, 'प्रदेश' कहलाता है। भूगोलविदों द्वारा 'प्रदेश' शब्द की व्याख्या कई अर्थों में व्यापक रूप से की गई है। प्रदेश का तात्पर्य किसी क्षेत्र विशेष की प्रकृति से होता है। प्रदेश सामान्यतः समान गुण और समान प्रकृति वाले क्षेत्र को कहते हैं अर्थात् सम्पूर्ण प्रदेश के लक्षणों में समांगता (Homogeneity) होती है। आधुनिक युग में प्रदेश को व्यापक, सूक्ष्म और शास्त्रीय अर्थ प्रदान किया गया है। प्रदेश एक ऐसी युक्ति है जिसके द्वारा पृथ्वी तल पर समानताओं और विभिन्नताओं को समझा जाता है। प्रदेश एक ऐसा क्षेत्र है जो कुछ विशेषताओं से युक्त एक इकाई है।

जलवायु परिवर्तन और तटीय क्षेत्रों पर इसका प्रभाव यह भी पढ़ें Click here

परिभाषाएँ- 'प्रदेश' शब्द भूगोल में क्षेत्रीय अध्ययन के साथ प्रयुक्त होता रहा है। अतः सम्बन्धित विद्वानों के लिए इसे परिभाषित करना भी महत्वपूर्ण कार्य रहा है। यहाँ कुछ विद्वानों द्वारा दी गयी परिभाषाएँ प्रस्तुत की गयी हैं-


हरबर्टसन के अनुसार - "प्रदेश एक ऐसा क्षेत्र है जिसमें थल, जल, वायु, प्राणी और मानव का एक सम्मिश्रण है, यह इन तत्वों के विशेष प्रकार के सम्बन्धों के कारण भू-सतह पर एक निश्चित एवं विशेष भाग बन जाता है।"


डी. लॉ ब्लाश - "प्रदेश एक ऐसा क्षेत्र है जिसके अन्तर्गत अनेक असमान प्राणी आकस्मिक अथवा कृत्रिम संयोग से एक साथ हो जाने पर कालान्तर में एक सह अस्तित्व के साँचे में ढल गए हों।


डिकिन्सन-"प्रदेश एक ऐसा क्षेत्र है जिसके सम्पूर्ण भाग में एक विशेष प्रकार की प्राकृतिक दशाओं से एक विशेष प्रकार का आर्थिक जीवन विकसित हुआ है।"


प्लाट (Platt) - "प्रदेश एक ऐसा क्षेत्र है जो भू-स्वरूप और भू-आधिपत्य में समांगता के आधार पर सीमांकित किया गया है।"


फेनेमान-"प्रदेश एक ऐसा क्षेत्र है जिसमें सर्वत्र समान भू-तलीय दशायें मिलती हों और जो समीपवर्ती क्षेत्रों से सर्वथा भिन्न  

योजना अधिकारियों का अमेरिका परिषद्- "प्रदेश एक ऐसा क्षेत्र है जिसमें वातावरण के समायोजन के परिणामस्वरूप एक विशिष्ट मानव प्रतिरूप विकसित हुआ हो।" यंग-"प्रदेश एक ऐसा क्षेत्र है जो एक सांस्कृतिक सूत्र में आबद्ध हो। सूत्रबद्धता की प्रक्रिया आर्थिक तत्वों से प्रारम्भ होकर क्रमशः वैचारिक, शैक्षणिक और मनोरंजन सम्बन्धी विचार साम्य तक जाती है, जिसके परिणामस्वरूप यह क्षेत्र अन्य क्षेत्रों से विशिष्ट एवं अलग हो जाता है।"


वूफ्टर (Woofter) - "प्रदेश एक ऐसा क्षेत्र है जिसमें वातावरण और जन समुदाय सम्बन्धी कारकों के संयोग से आर्थिक और सामाजिक संरचना सम्बन्धी समांगता अथवा समानता उत्पन्न हुई हों।"


हिटलसी- "प्रदेश एक ऐसा क्षेत्र है जो किसी भी आकार और विस्तार का हो परन्तु उसमें क्षेत्रीय अन्तर्सम्बन्धों से उत्पन्न तत्व अथवा तत्वों पर आधारित सामंजस्य मिलता है।" ग्रिग- "प्रदेश एक ऐसा क्षेत्र है जो चतुर्दिक क्षेत्रों से किसी सुपरिभाषित सन्दर्भ में विशिष्ट स्वरूप वाला होता है।"


टेलर- "प्रदेश भू-सतह की एक क्षेत्रीय इकाई है।"


related topics


ज्योर्ग (W.L.U. Joerg)- "प्रदेश वह क्षेत्र है जिसके भौतिक अभिलक्षणों में समांगता होती है।"


रेनर (G.T. Renner) - "प्रदेश एक विशुद्ध क्षेत्र है जो अपने सम्बद्ध क्षेत्र से प्राकृतिक और सांस्कृतिक विभेदन को अभिव्यक्त करता है।"


हार्टशोर्न (HartShorne) - "प्रदेश एक निश्चित स्थिति का क्षेत्र है जो आस-पास के क्षेत्रों से किसी न किसी प्रकार भिन्न होता है जहाँ तक यह विभेद मिलता है।"


बोतकिन (B.A. Botkin) - "प्रदेश, पर्यावरण प्रकार के लिये भूगोलविदों की एक ऐसी अभिव्यक्ति है जिसमें भौगोलिक तत्वों के निश्चित और स्थायी सम्बन्धों को व्यक्त किया जाता है।


थ्रिफ्ट (Thrift) - "प्रदेश मानवीय क्रियाओं और सामाजिक संरचना का एक सम्मेलन स्थल है।"

उपर्युक्त परिभाषाओं से स्पष्ट है कि-

1. प्रदेश की प्रायः अपनी निश्चित सीमा होती है।

2. उस सीमा के लक्षणीय तत्वों की प्रायः समरूपता अथवा एकरूपता दृष्टिगोचर होती है।

3. ऐसी समरूपता या एकरूपता वहाँ के प्राकृतिक, जैविक एवं पूर्व के मानवीय परिवेष एवं मानवीय क्रियाकलाप के अन्तर्सम्बन्धों एवं गतिशील अन्तर्क्रियाओं से सृजित हुई है।

4. प्रदेश विशेष के क्षेत्रीय लक्षण निकटवर्ती प्रदेशों के क्षेत्रों से भिन्न रहते हैं


महत्ता-औद्योगिक क्रान्ति के बाद जिस प्रकार से अनगिनत क्षेत्रों में मानव ने विविधता के चहुँमुखी विकास किया उससे भी भूतल का स्वरूप तेजी से एवं प्रभावित क्षेत्रों में प्रायः पूर्णतया परिवर्तित होने लगा है। ऐसे परिवर्तन का भी अपना क्षेत्रीय महत्व रहा है एवं ऐसे क्षेत्रों में स्वरूपित का भी विशेष महत्व है। यह तत्व अपने आप में तत्व सहवास-अन्तर्सम्बन्ध एवं अपने स्वतन्त्र व्यक्तित्व की भिन्नता लिये आदि विभिन्न स्तर पर जटिल समायोजन में मिलते हैं। अतः वर्तमान में प्रदेशों की धारणा का भौगोलिक अध्ययन एवं शोध में सबसे महत्वपूर्ण स्थान बना हुआ है। शोध के परिणामस्वरूप प्रदेशों की अपनी संकल्पना विकसित हो सकी है। इसीलिए रिटर, हरबर्टसन, पेसार्गे, रिचथोफन, हेटनर, ब्लाश, लाउटेन्श, हार्टशोर्न, कार्ल ट्रॉल, कार्ल सावर, डिकिन्सन, पी. जैम्स आदि विद्वानों ने प्रदेशों की संकल्पना एवं पारिस्थितिकी को भौगोलिक अध्ययन में यथोचित महत्व दिया है। 
यहाँ तक कि जर्मनी में तो प्रदेशों की संकल्पना को भूगोल का हृदय भी माना है। प्रदेश संकल्पना का विकास-भौगोलिक विचारधारा के विकास क्रम में 'प्रदेश' शब्द किन-किन अर्थों में प्रयुक्त हुआ है और इसकी परिभाषा में क्या-क्या परिवर्तन हुए हैं यह जानना उचित होगा। 17वीं शताब्दी में जर्मन विद्वान वारेनियस ने भूगोल के दो पक्षों 'सामान्य भूगोल' और 'विशेष भूगोल' की ओर संकेत किया। सामान्य भूगोल के अन्तर्गत समस्त पृथ्वी के प्रायः भौतिक तथ्यों का क्रमबद्ध वर्णन सम्मिलित था और विशेष भूगोल में प्रादेशिक वर्णन था जिसमें भौतिक व मानवीय दोनों पक्ष सम्मिलित थे। उन्नीसवीं शताब्दी में जर्मन विद्वान कार्ल रिटर ने प्रादेशिक अध्ययन के लिये 'लाण्डेर कुण्डे' शब्द का प्रयोग किया जिसके अन्तर्गत पृथ्वी तल को विभिन्न प्रदेशों में विभक्त किया गया। रिटर के ग्रन्थ 'अर्ड कुण्डे' का उद्देश्य पृथ्वी के प्रदेशों की अलग-अलग पूर्णरूपता और समस्त पृथ्वी की भी पूर्णरूपता खोजना था। उन्होंने अफ्रीका महाद्वीप का पूर्ण अध्ययन प्रस्तुत किया और उसको प्रदेश व उप प्रदेशों में विभक्त कर प्रत्येक का वर्णन भी प्रस्तुत किया है। उनके द्वारा प्रस्तुत उप-प्रदेशों के सम्मिलित वर्णन और सम्पूर्ण अफ्रीका के एकत्र वर्णन में कोई अन्तर नहीं है। रेटजेल दूसरे जर्मन विद्वान थे, जिन्होंने उन्नीसवीं शताब्दी के अन्त में 'एन्थ्रोपोज्यॉग्राफी' और 'फोल्कर कुण्डे' ग्रन्थों में विभिन्न प्रदेशों का वर्णन किया। जर्मन विद्वानों ने 'लेण्डशाफ्ट' शब्द का प्रयोग 'प्रदेश अध्ययन के लिये किया, अर्थात् जिन अर्थों में 'क्षेत्र' या 'प्रदेश' भौगोलिक अध्ययन का विषय है, उन्हीं अर्थों में 'लैण्डशाफ्ट' भूगोल के अध्ययन का विषय है। जर्मन 'लेण्डशाफ्ट' को कुछ विद्वानों ने 'लेण्डस्केप' तुल्य समझा था परन्तु जर्मन 'लेण्डशाफ्ट' में केवल 'भूदृश्य' नहीं 'भूदृश्य एवं प्रदेशों' दोनों की आन्तरिक समांगता निहित है। फ्रांसीसी विद्वानों ने प्रादेशिक भूगोल के अनेक ग्रन्थ बीसवीं शताब्दी के प्रथम अर्द्धभाग में प्रस्तुत किये। इनमें विदाल दिला ब्लाश, गालो, दि मार्तोन, बौलिग आदि का योगदान विशेष उल्लेखनीय है। कुछ विद्वानों का 'प्रदेश' भौतिक व ऐतिहासिक विचारधाराओं का संश्लिष्ट रूप है। फ्रांस में कृषि प्रधान, प्रदेश को छोटी-छोटी इकाइयों में विभक्त किया गया था जिन्हें 'पेज' कहते थे। 'कम्पेज' ऐसे संश्लिष्ट प्रदेश थे जिनकी आन्तरिक समांगता प्राकृतिक, जैविक, सामाजिक एवं मानवीय आधारों पर निर्भर थी। सन् 1905 में ब्रिटिश भूगोल वेत्ता हरबर्टसन ने 'मेजर नैचुरल रीजस' लेख 'रॉयल ज्याग्राफीकल सोसाइटी' के समक्ष प्रस्तुत कर प्रादेशिक संकल्पना को लोकप्रिय बनाया। हरबर्टसन ने विश्व को राजनैतिक इकाइयों के स्थान पर प्राकृतिक प्रदेशों में विभक्त किया। इस विभाजन का आधार भू-रचना, स्थल विन्यास, जलवायु, वनस्पति आदि कारकों पर निर्भर है जो प्रदेश की आन्तरिक समांगता बनाये रखते हैं। कुछ आलोचकों ने इस आधार पर हरबर्टसन के प्राकृतिक प्रदेशों की कटुआलोचना की, कि उन्होने प्रदेशों के निर्धारण में मानवीय व सामाजिक तत्वों की अवहेलना की है। परन्तु यह आलोचना उचित प्रतीत नहीं होती क्योंकि स्वयं हरबर्टसन ने लेख के आरम्भ में ही यह व्यक्त कर दिया कि प्राकृतिक अथवा निर्जीव और जीवधारियों में 'साहचर्य' पाया जाता है। इसी साहचर्य का निर्वाह हरबर्टसन ने प्राकृतिक प्रदेश में किया। अतएव यह कहना भ्रांति मूलक है कि हरबर्टसन के 'प्रदेश' केवल भौतिक हैं, सामाजिक नहीं। इस दृष्टि से संसार स्वयं एक विस्तृत प्रदेश है जिसकी अपनी भौगोलिक समांगता है। संसार का 'पूर्णत्व' ही उसकी समांगता है। इस समांगता के कारण ही सम्पूर्ण संसार अथवा किसी निश्चित आधार पर निर्धारित उसका छोटे से छोटा भाग या प्रदेश व्यवहारिक बना हुआ है।


NOTE- इसी तरह के विषयों  पर आगामी पोस्ट प्राप्त करने के लिए हमारे टेलीग्राम समूह में शामिल हों।

telegram link- join telegram channel

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

मध्यप्रदेश के स्वतन्त्रता संग्राम के स्त्रोतों प्राथमिक द्वितीयक स्त्रोतों का वर्णन ।(Sources of Freedom struggle in Madhya Pradesh)

मध्यप्रदेश के स्वतन्त्रता आन्दोलन के स्त्रोत (Sources of Freedom struggle in Madhya Pradesh) स्त्रोत वह माध्यम है जो किसी भी विषय वस्तु की व्यापक एवं प्रामाणिक जानकारी तथ्यों के साथ हमारे सामने रखते हैं। स्त्रोत में निहित ऐतिहासिक तथ्य इतिहास की रीढ़ की हड्डियों के समान हैं। ऐतिहासिक तथ्य ठोस, कठोर तथा यथार्थ परक होते हैं। इन्हीं तथ्यों की विश्लेषणात्मक व्याख्या इतिहास लेखन का आधार है।  किसी भी राष्ट्र के राष्ट्रीय आन्दोलन का इतिहास उस राष्ट्र की अमूल्य धरोहर होता है। राष्ट्रीय आन्दोलन की घटनाएँ, उससे जुड़े देश-भक्तों का बलिदान, स्मारक, साहित्य आदि उस देश के लोगों के लिए प्रेरणा का कार्य करते हैं। इसके साथ ही इन स्त्रोतों से राष्ट्रीय भावना भी सतत् जीवन्त रहती है। मध्यप्रदेश के स्वतन्त्रता संघर्ष से सम्बन्धित तथ्यों के प्रमुख दो स्त्रोत हैं- (अ) प्राथमिक स्त्रोत (ब) द्वितीय स्त्रोत।  (अ)प्राथमिक स्त्रोत- प्राथमिक , वे स्त्रोत कहलाते हैं, जो विषयवस्तु से प्रत्यक्ष रूप से जुड़े होते हैं। प्राथमिक स्त्रोत का संक्षिप्त वर्णन इस प्रकार है-  जलवायु परिवर्तन और तटीय क्षेत्रो...

प्रादेशिक नियोजन का उ‌द्भव और प्रकार अवधारणा प्रादेशिक नियोजन के विकास । (Concept of Regional Planning)

बाई.एन. पेट्रिक (Y. N. Petrik) के अनुसार, "प्रादेशिक नियोजन प्रदेश के प्राकृतिक संसाधन के उपयोग, प्राकृतिक पर्यावरणीय रूपान्तरण, उत्पादन शक्तियों तथा उसके विवेकपूर्ण संगठन पर आधारित है।" एल्डन व मॉरगन (1974) ने अपने लेख में इस बात पर जोर दिया है कि "प्रादेशिक नियोजन को न तो केवल आर्थिक नियोजन और न ही केवल भौतिक नियोजन के रूप में स्वीकार किया जा सकता है।" अपितु यह एक ऐसा नियोजन है जिसकी रुचि का केन्द्र भौतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक, राजनीतिक तत्वों को किसी प्रदेश विशेष के सन्दर्भ में समन्वित रूप की सोच पर केन्द्रित होती है।" इस तरह की संकल्पना में किसी प्रदेश विशेष की कोई विशेष अनुभव पूर्व समस्याएँ नहीं होतीं जिनके निदान के लिए परियोजना निर्मित होती है। इस तरह की संकल्पना में बहुस्तरीय प्रदानुक्रमण की कल्पना की जाती है। अतः नियोजन प्रक्रिया में प्रदेश (Space) का घटक भी चिन्हित होता है।  किसी प्रदेश के विकास हेतु अपने विभिन्न रूपों में एक प्रकार की दिशा निर्देशिका है कि प्राकृतवास, आर्थिकी एवं सामाजिकता के समाकलित विकास का पर्यवेक्षण है। फ्रीडमैन (1972) के श...

मध्यप्रदेश की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि ( गठन)

मध्यप्रदेश  की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि ( गठन) मध्यप्रदेश 1 नवम्बर, 1956 को अस्तित्व में आया और 1 नवम्बर 2000 को इस मध्यप्रदेश से छत्तीसगढ़ अलग हो गया, परन्तु इसके पूर्व (1956 के पूर्व) इतिहास के पन्नों में इसका स्वरूप कुछ और ही था।  सन् 1857 की क्रान्ति ने प्रमुख रूप से सागर-नर्मदा क्षेत्रों को ही प्रभावित किया था। दक्षिण भारत में केवल कुछ छींटे ही पहुँच पाए थे। यही कारण है कि अंग्रेजी इतिहासकारों  ने यहाँ की शांति व्यवस्था की खूब सराहना की है। नागपुर के कमिश्नर लाउडन तथा उसके डिप्टी कमिश्नरों ने अपनी रीति-नीति से इस क्षेत्र की शांति व्यवस्था को कभी भी भंग नहीं होने दिया, जबकि उत्तरी क्षेत्र बुन्देलखण्ड एक खौलती हुई कड़ाही की भाँति बन गया था। अतएव भारत के मध्य क्षेत्र में शांति स्थापित करने के लिए यह आवश्यक था कि बुन्देलखण्ड का समुचित निपटारा किया जाये। सन् 1858 में बुंदेलखंड का अंग्रेजी अधिकार क्षेत्र उत्तर-पश्चिम प्रान्त का एक अंग था। उत्तरी बुंदेलखण्ड के झाँसी, जालौन, बांदा और हमीरपुर अंग्रेजों द्वारा कब्जे में ले लिये गये थे और इनका प्रशासन आगरा स्थित लेफ्टिनेंट गवर्न...